वो रात की बात आज भी याद कर पाता हूँ ।

 वो रात की बात आज भी याद कर पाता हूँ ।

वो रात मे डरना
डर के सहमना
डर के माँ के आँचल से लिपटना
बहनों से लड़ना,
कि माँ के पास मैं सोऊँगा!
अक्सर इसमे सफलता पाना
कभी-कभार बहनें जीत और ;
मैं हार जाता था।
किन्तु रात मे देर तक जगना
अवसर को तलाशना
जगह बदल माँ मे सिमटना।
वो रात की बात आज भी याद कर पाता हूँ ।।

वो लोरी का श्रवण पान !
कुमार श्रवण की कहानियाँ
दशरथ की चूक, राम के आदर्श
सबरी के जूठे बेर, कुबढी के फल
कृष्ण की बदमाशीयाँ, यशोदा की डांट
और इन सबो मे माँ के मीठे स्वर;
मेरे रोचक प्रश्नों पर उसकी हंसी और कभी-कभार वो चुप्पी
उसके हस्तो का स्पर्श माथे पर भूल नही पाता हूँ,
वो रात की बात आज भी याद कर पाता हूँ ।।

प्रातः उठ माँ को निकट ना पाना,
वो ज़ोर – ज़ोर से विलाप करना!
कहती थी! यही हूँ, आ जा,
किन्तु जिद्दवश उसे ही बुलाना।
आते ही उसकी छाती से लिपट जाना, कस के पकड़ाना;
और ज़ोर से हुँकार भरना।
आज याद कर पाता हूँ ।
वो रात की बात आज भी याद कर पाता हूँ ।।

वो कार्तिक का महीना!
माँ प्रातः कृष्ण संग गंगा के घाट जाती थी।
कहता था ,मै भी चलूँगा।
सर्दी की हवाला देते हुए ना कर देती थी।
जाने की जिद्द पर अडिग रहना
वो नये-नये उपायों को खोंजना।
डर कि; मुझ बिन घाट न चली जाएँ,
रात में उसके आँचल को कस के पकड़कर के सोना,
प्रातः जल्दी उठ, शौच कर
उसके झोले मे अपने कपड़ों को ठूंसना
किवाड़ पर खड़े उसकी प्रतीक्षा करना,
वो मुस्कान विस्मृत नहीं कर पाता हूँ ;
वह रात की बात आज भी याद कर पाता हूँ ।।

दिन भर के उथल-पुथल
बहनों के साथ अनेक संग्राम से
वो रात मे पाँव का दूखना
असहनीय पीड़ा को उसके स्पर्श मात्र से भूलना,
उसकी स्नेहिल थपकी पाते ही
शांतिप्रिय स्वप्नो मे खो जाना।
वो रात की बात आज भी भूल,
नहीं पाता हूँ ।
उसकी ममतामयी आखों मे ममता आज भी देख पाता हूँ;
वो रात की बात आज याद कर पाता हूँ ।।

हे! दो माता के प्रेम से सिंचित
कृष्ण; एक प्रार्थना है!
माँ की ममता से दूर न होने देना
अपने शिष्य को मातृ विहिन न होने देना,
इन स्मृतियों को कभी भूलने न देना,
इन्हें सदैव जीवंत ही रहने देना।
मृत शय्या पर लेटे तेरी याद आय न आयें,
माँ की स्मृतियों से स्नान करा देना।
उसकी लोरीयों का गुञ्ञन कर्णों मे करा देना।

उस स्नान से पवित्र कराकर ही,
अपने पास बुला लेना!
शीघ्र अति शीघ्र; वहाँ भी मेरी माँ से शीघ्र मिलन करा देना।

माँ की ममता का वर्णित करती ,
लेखनी को रोक नहीं पाता हूँ ।

वो रात की बात आज भी याद कर पाता हूँ !

माँ को समर्पित !

Kumar Adarsh

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