उलझाने की चाहत

 उलझाने की चाहत

उलझाने की चाहत हूं मैं,
उलझने से राहत रखता हूं!
यह सामने वाला कितना बोलता है;
मैं चुप कैसे रह सकता हूं ?
क्या जाने कब क्या होगा?
आज बोल ही लेता हूं।

भाग्य से श्रोता मिला है,
अवसर का लाभ उठाना है,
पता ना अब कब मिलेगा?
आज ही वर्तमान से भविष्य की यात्रा तय कर लेना है!

चिंता है कल की, जो देखा नहीं
इच्छा है फल की ,वृक्ष लगाया नहीं;
चाहत है खाना ,जो बनाया नहीं
देना है भाषण,जो कभी तोतलाया नही,
मन है दौड़ने का ,जो कभी चला नहीं

रात की रागिनी चांद की चांदनी सूर्य की रोशनी जल की शालिनी सब एक ही क्षण में होता नहीं!

क्या क्या होगा पता नहीं,
अपना कर्म पूरा करते हैं ।
क्या जाने क्या घटित होगा?
व्यर्थ की चिंता क्यों करते हैं?
चिंता चिता है इसे सत्य मान लेते;
कर्म ही धर्म हैं, फल की चिन्ता क्या करना हैं!

कर्तव्यों का निर्वहण करने मे समय का सदुपयोग करते है,
कृष्ण सबके है! इस बात क्यो नहीं आप मान लेते हैं??

Kumar Adarsh

1 Comment

  • Man to kar rha hai Itni sunder kavita likhne wale kavi ki ungaliya kaat lu

    Phir sochta hu

    Kavitaye udaas ho jayengi

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